Sunday, 7 September 2014

भारत में कैसे बंद होगी गौहत्या ?

भारत में कैसे बंद होगी गौहत्या ?
               भारत ही केवल एकमात्र देश है जिसे माता यानि भारतमाता कहा गया है और केवल गाय ही एकमात्र प्राणी है जिसे माता की संज्ञा दी जाती है. गाय को पशु नहीं कहा जाता गौमाता कहा जाता है. आपने कभी भी हिरणी माता, शेरनी माता , भैंस माता या घोड़ी माता आदि नहीं सुना होगा केवल गाय को ही माता ही कहा जाता है और कहना भी चाहिए क्योंकि सनातन धर्मं के अनुसार 33 कोटि देवी देवता गाय माता में निवास करते हैं, गाय के गोबर और गौमूत्र को बहुत पवित्र माना जाता है. गाय माता जितनी ओक्सिजन लेती है उसमे से 85% ओक्सिजन वापिस छोड़ देती है , बाकी सभी प्राणी तो 100% कार्बन छोड़ते हैं लेकिन केवल गाय माता है जो 15% ही कार्बन छोडती है तथा 85% ओक्सिजन छोडती है. सुना है की अमेरिका ने गौमूत्र को पेटेंट करवा लिया है और अब गौमुत्र के लिया या तो अमेरिका में गौपालन पर ध्यान दिया जाएगा या दुसरे देशों से गौमूत्र मंगवाया जाएगा क्योंकि गौमूत्र और गौमूत्र अर्क से असंख्य असाध्य बीमारियाँ भी ठीक हो जाती है. अमेरिकी लोग गाय को माता नहीं कहते, केवल विज्ञान के आधार पर गौ माता की रक्षा करने को तैयार हैं लेकिन हम भारतवासी तो गाय को माता कहते हैं फिर भी गाय माता की रक्षा नहीं कर पा रहे, हमारी संसद गौहत्या विरोधी कानून नहीं बना पा रही. मै प्रणाम करता हूँ उन सभी गौभक्तों को जो गौरक्षा के प्रतिबद्ध हैं तथा दिन रात गौरक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं.
                    आजादी के 68 साल के बाद भी हम गौहत्या पर रोक नहीं लगा सके, बहुत से साधू संतों ने गौहत्या रोकने के आन्दोलन भी चलाये लेकिन हमारी सरकार और हमारे राजनेता पता नहीं क्यों आज तक गौहत्या विरोधी कानून नहीं बना पाई ? जंहा तक मैंने सुना है हमारी सरकार गौहत्या विरोधी कानून बनाने की बात तो दूर उल्टा गौहत्या करने वाली फैक्ट्रीयों को सरकार की ओर से सब्सीडी दी जाती है. क्या कारण है कि सरकार इन कंपनियो को प्रोत्साहन दे रही है, क्या ये गौहत्या करने वाली फक्ट्रियां सरकार की हैं या सरकार में बैठे मंत्रिओं / अधिकारिओं की हैं या उनके सम्बन्धियों की हैं ? आखिर इन गौहत्या करने वाले कत्लखानों की सचाई क्या है ? कौन है जो इन कत्लखानों को बढ़ावा दे रहा है और क्यों, उनका उद्देश्य क्या है ?
             क्या भारत में हो रही गौ हत्या के लिए केवल सरकार ही जिम्मेदार है ? या फिर गाय को माता कहने वाले और अपने आप को हिन्दू कहने वाले वो लोग भी जिम्मेदार हैं जो गाय को मात्र एक पशु मानकर केवल दूध के लिए ही पालते हैं और जब गाय माता दूध देना बंद कर देती है तो उसको कसाई को बेच देते हैं और यह जानते हुए बेच देतें हैं कि ये आदमी इसको कत्लखाने ले जाएगा. जिस गौमाता ने सारी उम्र आपको और आपके बचों को दूध पिलाया, जिस बैल ने सारी उम्र आपके खेत में खूब कमाया, जिसको आप नंदी कहकर पूजा करते हैं, जब आप मंदिर में जाते हैं तो वंहा इसी बैल को भगवन नंदी कहकर चरण धोकर अपने को धन्य महसूस करते हैं और अब जब यही नंदी और गाय माता बूढ़े हो गए हैं, जो न तो दूध दे सकते हैं और न ही खेत में हल चला सकते हैं, तो हम इनको कसाई के हवाले कर देते हैं. जरा सोचिए क्या हमारी माता और भगवान के प्रति इतना ही समपर्ण है ? फिर हम सरकार को दोष देते हैं कि सरकार गौहत्या रोकने के कानून नहीं बनाती. भाइयों बहनों मै यंहा पर निवेदन करना चाहूँगा की यदि प्रत्येक हिन्दू केवल एकमात्र यह संकल्प कर ले कि वह गौमाता और गौवंश को कभी भी नहीं बेचेगा तो सरकार कानून बनाये या ना बनाये फिर गौहत्या अपने आप बंद हो जायेगी . सरकार पर दोष लगाने से पहले क्या हमने गौवंश को नहीं बेचने और उसकी सेवा का कानून अपने घर में बनाया है ? क्या हमने गौरक्षण एवं संवर्धन की कोई योजना अपने घर में बनाई है ? याद रखें गाय सरकार की माता नहीं है क्योंकि यदि गाय सरकार की माता होती तो गौहत्या विरोधी कानून आजादी के तुरंत बाद संसद का जो पहला सत्र हुआ था उसमे सबसे पहला क़ानून गौहत्या विरोधी कानून पास होना चाहिय था लेकिन याद रखें कि गाय हमारी माता है, अतः हमें ही अपनी माता की रक्षा करनी होगी और हमें ही गाय माता के दूध का ऋण चुकाना होगा. मैंने कई बार गलियों में देखा है कि गाय एक आवारा पशु की तरह ही घूम रही है यह वो गाय हैं जिनके मालिक सुबह शाम दूध निकालकर इनको छोड़ देतें हैं और ये दर दर जाकर दस्तक देती है, हुंकार करती है ताकि कोई उसे खाने को कुछ दे दे और दुसरे शब्दों में कहूँ तो ये हमारे लिए बड़े ही शर्म की बात है कि गाय को खाने के लिए, चारे पानी के लिए दर दर भटकना पड़ता है. किसी ने रोटी का टुकड़ा दिया तो दिया नहीं तो फटकार दिया.

            सन 1948 या 1950 में जब भी भारत की पहली संसद बैठी थी तो स्व श्री महावीर त्यागी (सांसद सोनीपत) ने संसद में गौहत्या विरोधी कानून बनाने का प्रस्ताव पेश किया था और लगभग सभी सांसद भी उनका समर्थन कर रहे थे, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने इस्तीफ़ा देने की धमकी देकर उस प्रस्ताव को वापिस करवा दिया. फिर एक बार श्री अटल बिहारी वाजपाई जी जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने भी गौहत्या विरोधी कानून बनाने की कौशिश की लेकिन सुश्री ममता बैनर्जी ने इसका विरोध किया. जरा सोचिये क्या ऐसे गौमाता और गौवंश की रक्षा हो पाएगी ? क्या गौवंश बच पायेगा ? क्या हम केवल सरकार के ही भरोसे बैठे रहेंगे ? क्या हमारा अपनी संस्कृति और धर्मं के प्रति कोई दायित्व नहीं है ? क्या हम केवल नाम मात्र के ही गाय माता के पुत्र बने रहेंगे ? क्या हम सब की गाय माता की रक्षा की कोई जिम्मेदारी नहीं है ?